मोदी से अब किसको उम्मीद!

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफे की कॉकरोच जनता पार्टी की मांग के समर्थन में भूख हड़ताल पर बैठे सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की तबीयत पिछले हफ्ते काफी बिगड़ गई, तो अभिजित दीपके ने कहा कि अनेक राजनीतिक दलों के नेता, सामाजिक कार्यकर्ता, सोशल मीडिया इन्फ्लूएंसर आदि अपना समर्थन जताने वहां आए हैं, “लेकिन सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के किसी व्यक्ति ने अभी तक हमसे मुलाकात नहीं की है और ना ही हमारे साथ बातचीत करने में कोई दिलचस्पी दिखाई है।”

कॉकरोच जनता पार्टी के संयोजक दीपके ने कहा- “मुझे नहीं पता कि सरकार ने इस देश के नागरिकों के प्रति इतना उपेक्षापूर्ण रुख क्यों अपना रखा है। हम तो बस जवाबदेही की मांग कर रहे हैं। हम यह नहीं कह रहे हैं कि हमें या सोनम वांगचुक को शिक्षा मंत्री बना दिया जाए। हमारी बस इतनी-सी मांग है कि जवाबदेही तय की जाए और शिक्षा मंत्री के रूप में उस व्यक्ति को बदला जाए, जो ठीक से परीक्षाएं आयोजित कराने में विफल रहा है।”

दीपके की ये टिप्पणी भारतीय लोकतंत्र पर एक बुनियादी सवाल है। भारत में अगर सचमुच लोकतंत्र है, तो जवाबदेही की अपेक्षा सटीक है। यह तथ्य है कि भारत में परीक्षा आयोजन का पूरा तंत्र ढहता चला जा रहा है। नीचे से हुई शुरुआत धीरे-धीरे उन परीक्षाओं तक पहुंच गई है, जिनमें समाज के अपेक्षाकृत संपन्न तबकों से आए छात्र भाग लेते हैं। भारत के प्रधान न्यायाधीश की बेरोजगार नौजवानों के प्रति अपमान-भरी टिप्पणी पर आक्रोश जताने के लिए व्यंग्य के रूप में शुरू की गई कॉकरोच जनता पार्टी की पहल एक जमीनी एवं ठोस विरोध प्रदर्शन में तब्दील हो गई, तो उसकी वजह उन संपन्न तबकों तक में अब पैदा हुई बेचैनी ही है।

बेचैनी इस लाचारी से जन्मी है कि सब कुछ बिगड़ता जा रहा है, लेकिन शासन-तंत्र के उच्चतम पदों पर बैठे लोगों को ना तो उसकी चिंता है, और ना ही ढहती व्यवस्थाओं के लिए कोई जवाबदेह है। जवाबदेह से सीधा मतलब उस पदाधिकारी से होता है, जो पीड़ितों के सवाल का जवाब देने के लिए बाध्य हो। अगर उसके पास संतोषजनक उत्तर नहीं है, तो लोकतंत्र में यह वाजिब अपेक्षा होती है कि उसे अपने पद से हट जाना चाहिए। कॉकरोच जनता पार्टी के समर्थक इसी मांग को लेकर नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर इकट्ठे हुए हैं।

वांगचुक और छह छात्र इसी मांग को मनवाने के लिए आमरण भूख हड़ताल पर बैठे हैं।  

दिल्ली की उमस भरी असह्य गरमी और बीच-बीच में तेज बारिश के बावजूद जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल और अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे व्यक्तियों के बारे में शायद ही यह कहा जा सकता है कि वे भाजपा की सत्ता को चुनौती दे रहे हैं या वे उसके वैचारिक विरोधी हैं।

यहां यह याद करना उचित होगा कि अगस्त 2019 में सोनम वांगचुक ने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाने और लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाने के फैसले का पुरजोर समर्थन और स्वागत किया था। वांगचुक ने सोशल मीडिया पर वीडियो और ट्वीट साझा कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का आभार व्यक्त किया था और उस फैसले को लद्दाख के “30 साल पुराने सपने का सच होना” बताया था। 

क्या इसके बावजूद भाजपा और उसका मीडिया नेटवर्क वांगचुक को ‘अर्बन नक्सल’ या ‘राष्ट्र विरोधी’ बता सकते हैं? वांगचुक खुद को महात्मा गांधी का अनुयायी मानते हैं। उन्होंने कहा है कि वे गांधीजी के अहिंसक प्रतिरोध के दर्शन में यकीन करते हैं और उनके ही मार्ग का अनुपालन करते हुए “सरकार की चेतना को जगाने” के लिए भूख हड़ताल पर बैठे हैँ। 

इसके बावजूद भाजपा सरकार ने उनकी खोज-खबर नहीं ली है, तो उसका सीधा अर्थ यही माना जाएगा कि उत्तरदायित्व की न्यूनतम अपेक्षाओं को भी वह ठेंगे पर रख कर चल रही है। लेकिन, इस नजरिए ने ‘मोदी से मोहभंग’ की एक स्पष्ट परिघटना शुरू की है, जिसका इजहार उन धुर दक्षिणपंथी हलकों में भी हो रहा है, जो अभी भी मोदी को बाकी नेताओं से “दस गुना” बेहतर मानते हैं।

ऐसी राय रखने वाले व्यक्ति भी यह कहने लगें कि गलती ना मानने और गलती करने वाले मंत्रियों को ना हटाने का मोदी का नजरिया ठीक नहीं है, तो उसमें अंतर्निहित संदेश को समझने की जरूरत है।  

भाजपा/आरएसएस के वैचारिक क्षेत्र से जुड़े राजनीतिक विश्लेषक आनंद रंगनाथन ने हाल में दक्षिणपंथी रुझान वाले पत्रकार अजित भारती के साथ पॉडकास्ट में कुछ ऐसी ही बाते कहीं। हालांकि कॉकरोच जनता पार्टी के संदर्भ में “हर बात के विरोध की प्रवृत्ति” की उस पॉडकास्ट में आलोचना की गई, लेकिन जवाबदेही तय करने की मांग को सही ठहराया गया।

रंगनाथन ने इस प्रश्न पर अपनी समझ रखी कि नरेंद्र मोदी अपने मंत्रियों को क्यों नहीं हटाते। उन्होंने कहा कि मोदी की कार्यशैली में चुनावी जीत ही सबसे बड़ा और एकमात्र पैमाना है। मोदी का मानना है कि जब तक जनता उन्हें चुनावों में भारी बहुमत से जिता रही है, तब तक “गलती करने वाले” मंत्रियों को हटाने की जरूरत नहीं है।  

रंगनाथन ने जोर डाला कि चुनावी जीत के अहंकार या आत्म-विश्वास के कारण सरकार अपने समर्थकों, जनता, या आंदोलनों की जायज मांगों को भी अनसुना कर देती है, क्योंकि उसे लगता है कि चुनावी नतीजे ही अंतिम पैमाना हैं। उन्होंने स्वीकार किया बिना किसी प्रशासनिक जवाबदेही के केवल चुनावों को ही कसौटी मान लेना लोकतंत्र और सुशासन के लिए ठीक नहीं है। बहरहाल, उन्होंने कहा कि विकल्प के तौर पर मौजूद नेताओं से ‘मोदी दस गुना बेहतर हैं’। 

ये टिप्पणी उस विश्लेषक की है, जिसे विपक्षी खेमों में ‘मोदी-भक्त’ के रूप में जाना जाता रहा है। अगर ऐसे व्यक्तियों के मन में भी समर्थन के सकारात्मक कारणों का ह्रास हो रहा हो और वे समर्थन देने की मजबूरी बताने लगें, तो समझा जा सकता है कि मोदी के नेतृत्व के प्रति आम नजरिया किस रूप में बदल रहा है।   

इस बात को और स्पष्ट करने के लिए एक और पॉडकास्ट की चर्चा उचित रहेगी। इसमें बॉलीवुड की मशहूर पार्श्व गायिका अनुराधा पौडवाल ने जो कहा, उसके बारीक मतलब को समझने की जरूरत है।

उन्होंने कहा- ‘कुछ साल पहले तक मेरे मन में भी यह उम्मीद थी कि देश वाकई विश्व-गुरु बनेगा। लेकिन वर्तमान में जो स्थितियां दिख रही हैं, वे इस दावे के ठीक उलट हैं। अब देश को विश्व-गुरु बनाने वाली चीजों के बजाय उसके विपरीत दिशा में ले जाने वाली चीजें ज्यादा हो रही हैं।’ अतः पौडवाल ने कहा- “विश्वगुरु-विश्वगुरु का यह नॉनसेंस बंद होना चाहिए।”

अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी की घटना से पौडवाल खास आहत नजर आईं। कहा कि जो मंदिर ‘हमारे सनातनी गौरव का प्रतीक है’, वहां भी चढ़ावे की चोरी और डाका जैसी घटनाएं हो रही हैं। ऐसी घटनाएं आस्था के लिए एक गहरा झटका हैं। फिर पौडवाल ने शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाया। कहा कि एक तरफ तो कहा जाता है कि देश के लोग ज्यादा से ज्यादा पढ़े-लिखे बनेंगे, लेकिन दूसरी तरफ देश में हजारों सरकारी स्कूल बंद हो गए हैं।

तो पौडवाल ने एक गौरतलब मांग रखी। कहा कि सरकार को उन चीजों की सूची पेश करनी चाहिए, जो विश्व-गुरु बनने पर देश में हो जाएंगी। ऐसी सूची हो, तभी लोग इसका अर्थ समझ सकेंगे। 

पौडवाल मशहूर शख्सियत हैं। उनकी बातों से जाहिर है कि उनका मोदी युग में बनाए गए कथानकों में लंबे समय तक यकीन रहा। मगर अंततः हकीकत निराधार कहानियों के जरिए जुटाए गए समर्थन पर भारी पड़ रही है। 

रंगनाथन और पौडवाल दो सैंपल हैं, जिनके जरिए हम मोदी समर्थक खेमे में बढ़ रही उधेड़बुन का अंदाजा लगा सकते हैं। ढहते इन्फ्रास्ट्रक्चर, बढ़ते भ्रष्टाचार के संकेत, राम मंदिर जैसे “आस्था केंद्र में लूट एवं भ्रष्टाचार”, मध्य और उच्च मध्य वर्ग तक पहुंचती आर्थिक मुश्किलें, नाकाम होती शिक्षा एवं परीक्षा व्यवस्था, और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गिरती हैसियत एवं बिगड़ती छवि को नजरअंदाज करना अब उन खेमों के लिए आसान नहीं रह गया है।  

अंतरराष्ट्रीय छवि का हाल यह है कि अब प्रधानमंत्री मोदी की हर विदेश यात्रा उनके लिए नकारात्मक रिपोर्टिंग का मौका बनने लगी है। वैसे तो ये सिलसिला 2023 में निज्जर- पन्नू कांड में अमेरिका-कनाडा की ओर से लगाए गए आरोपों के साथ शुरू हो गया था, लेकिन अब इसमें दूसरे पहलू भी जुड़ते चले जा रहे हैं। कुछ हालिया उदाहरणों पर गौर करेः   

इस वर्ष मई में मोदी की नॉर्वे यात्रा के दौरान मीडिया का ध्यान द्विपक्षीय समझौतों से कहीं ज्यादा प्रेस स्वतंत्रता और भारतीय प्रधानमंत्री के मीडिया के प्रति रुख पर केंद्रित हो गया। यह विवाद पूरे अंतरराष्ट्रीय मीडिया में छाया रहा। ओस्लो में नॉर्वे के प्रधानमंत्री के साथ एक साझा प्रेस वक्तव्य के बाद जब मोदी जाने लगे, तो नॉर्वे की पत्रकार हेले लिंग स्वेनसेन ने चिल्लाकर पूछा- प्रधानमंत्री मोदी, आप दुनिया की सबसे आज़ाद प्रेस (नॉर्वे प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में नंबर वन है) से सवाल क्यों नहीं लेते?”

यह वीडियो क्लिप इंटरनेट पर वायरल हो गई। भारतीय सोशल मीडिया पर मोदी समर्थकों और ट्रोल्स ने उस महिला पत्रकार को निशाना बनाया। दूसरी तरफ कुछ वैश्विक मीडिया संगठनों ने इसे भारत में सिकुड़ती प्रेस स्वतंत्रता और मोदी द्वारा 12 वर्षों से कोई खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस ना करने के रिकॉर्ड से जोड़कर देखा। 

इसी महीने प्रधानमंत्री की ऑस्ट्रेलिया यात्रा के दौरान वहां के टीवी चैनल 7न्यूज़ के पत्रकार ब्लेक जॉनसन का एक वीडियो काफी चर्चा में रहा। इसमें उन्होंने कहा- “मोदी बिना तैयारी वाली यानी अनस्क्रिप्टेड प्रेस कॉन्फ्रेंस से बचने के लिए जाने जाते हैं। इसके बजाय वे पहले से तय और प्रबंधित आयोजनों को प्राथमिकता देते हैं।”

ऑस्ट्रेलियाई न्यूज चैनल स्काई न्यूज़ ने मेलबर्न के मार्वल स्टेडियम में आयोजित विशाल प्रवासी कार्यक्रम (मेलबर्न मीट्स मोदी) पर बेहद कड़ी टिप्पणी की। एंकर डेनिका डी जॉर्जियो ने इस भव्य आयोजन की आलोचना करते हुए इसे कूटनीति नहीं, बल्कि राजनीति करार दिया। आरोप लगाया कि ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज और वहां की सरकार स्थानीय स्तर पर भारतीय मूल के मतदाताओं को रिझाने के लिए इस कार्यक्रम का इस्तेमाल कर रहे हैं और यह सब ऑस्ट्रेलियाई करदाताओं के पैसे पर हो रहा है।

अखबार गार्डियन के ऑस्ट्रेलियाई संस्करण में मोदी के आगमन पर स्थानीय मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और ‘अलायंस अगेंस्ट इस्लामोफोबिया’ जैसे संगठनों द्वारा किए गए विरोध प्रदर्शनों को प्रमुखता दी गई। इस तरह की अन्य रिपोर्टों में दूसरे मीडिया घरानों ने भी ऑस्ट्रेलिया सरकार से कहा कि वह भारत में मानवाधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, और धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर आवाज उठाए। 

उसी यात्रा के अगले चरण में प्रधानमंत्री न्यूजीलैंड गए। वहां हुई रिपोर्टिंग भी खासी चर्चित रही। न्यूज़ीलैंड के समाचार माध्यम स्टफ ने सुरक्षा और अन्य तैयारियों से जुड़े विशिष्ट विवरण प्रकाशित किए। बाद में इस रिपोर्ट को भारतीय मीडिया और सोशल मीडिया में बड़े पैमाने पर साझा किया गया। स्टफ की रिपोर्टिंग से सामने आई मुख्य बातें थीं:

मोदी के अग्रिम सुरक्षा और इंतजाम दस्ते ने न्यूजीलैंड सरकार से अनुरोध किया था कि भारतीय प्रधानमंत्री के कार्यक्रमों के लिए ऐसे स्थानों को प्राथमिकता दी जाए, जहां उन्हें सीढ़ियों का उपयोग ना करना पड़े।

रिपोर्ट में दावा किया गया कि भारत की ओर से न्यूज़ीलैंड के आयोजकों को कार्यक्रम इस तरह तैयार करने का निर्देश दिया गया था, जिसमें मोदी के लिए दिन में आराम और हलकी नींद का समय निकाला जा सके। 

मोदी उम्र के जिस पड़ाव (75 वर्ष से अधिक) पर हैं, उनमें इस रूप में कार्यक्रम बनाने का सुझाव देने में कुछ भी असामान्य नहीं है। आम तौर पर ऐसी बातों पर लोगों का ध्यान भी नहीं जाता, अगर गुजरे वर्षों में प्रधानमंत्री के प्रचार-तंत्र ने उनकी अति-मानवी यानी सुपर ह्यूमन की छवि नहीं बना रखी होती।

अभी ज्यादा समय नहीं गुजरा, जब मेनस्ट्रीम मीडिया में विमान से बिना रेलिंग पकड़े मोदी के उतरने की तस्वीरों की तुलना चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के रेलिंग पकड़ कर उतरने से की जाती थी और उस आधार पर भारत को चीन से अधिक ताकतवर बताया जाता था! इसी पृष्ठभूमि के कारण स्टफ की रिपोर्ट में शामिल बातों ने ध्यान खींचा। इससे संदेश ग्रहण किया गया कि आखिरकार मोदी भी आम इनसान ही हैं- वे भी थकते हैं और उन पर भी उम्र का असर है!

भारत में मेनस्ट्रीम मीडिया और सत्ता पक्ष के प्रचार तंत्र ने स्टफ की रिपोर्ट को सहजता से नहीं लिया। थकान और उम्र का असर बताने वाली बातों को “काल्पनिक और भ्रामक” बताने की मुहिम उन्होंने छेड़ी। मगर वक्त-वक्त की बात होती है। अब पुरानी कहानियां लोगों को लुभा नहीं रही हैं। खुद भाजपा/आरएसएस के समर्थक दायरे में ‘मोदी है तो मुमकिन है’ के कथानक में यकीन का दौर तेजी से गुजर रहा है। इसकी जगह (किसी और को वोट ना देने की) ‘मजबूरी है, इसलिए मोदी हैं’- जैसी राय बनने लगी है। 

इस बदलाव का व्यवहार में क्या असर होगा, इस बारे में फिलहाल हम कोई अनुमान नहीं लगा रहे हैं। जब राजनीति का संदर्भ बिंदु बदल चुका हो और नए किस्म के विमर्श का चलन हो, तब यकीन के साथ कुछ कहना आसान नहीं रह जाता। बहरहाल, यह अलग चर्चा या लेख का विषय है।

(सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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